- इंदौर में होगा राज्य स्तरीय ‘लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता’ का आयोजन
- इस सप्ताह क्षेत्रीय OTT रिलीज़: अलग-अलग भाषाओं की 5 फ़िल्में जिन्हें अपनी वॉचलिस्ट में शामिल करें
- Regional OTT Releases This Week: 5 Films Across Languages to Add to Your Watchlist
- “15वां क्वालिटी मार्क अवॉर्ड्स 2026: गुणवत्ता और उत्कृष्टता के क्षेत्र में श्रेष्ठ उद्योगों एवं संस्थाओं को मिलेगा क्वालिटी मार्क का भव्य सम्मान”
- “15th Quality Mark Awards 2026: Outstanding Industries and Organizations in Quality and Excellence to Receive the Prestigious Quality Mark Honour”
‘सबसे अहम बात यह है कि, मैं स्क्रीन पर महिला किरदारों को लोगों के सामने किस तरह प्रस्तुत करती हूं’: भूमि पेडनेकर
भूमि पेडनेकर इस नई जनरेशन की सबसे उत्साही युवा कलाकारों में से एक हैं। बॉलीवुड में कदम रखने के कुछ सालों के भीतर ही इस यंग एक्ट्रेस ने ‘दम लगा के हईशा’, ‘टॉयलेट’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘बाला’, ‘सांड की आँख’, ‘सोन चिरैया’ जैसी कई अलग-अलग फ़िल्मों के जरिए कुछ दमदार और शानदार महिला किरदारों को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है।
भूमि कहती हैं, “मेरे लिए, सबसे अहम बात यह है कि मैं स्क्रीन पर महिला किरदारों को लोगोंके सामने किस तरह प्रस्तुत करती हूं। सिनेमा में लोगों की सोच को बदलने की ताकत है और मुझे लगता है कि हम महिला किरदारों के जरिए समानता और स्वतंत्रता के संदेश को सभी लोगों तक पहुंचा सकते हैं।
मैंने हमेशा ऐसे ही किरदारों की तलाश की है और इन किरदारों को पर्दे पर पूरे दिल से निभाया है। मैं ख़ुशकिस्मत हूं कि मुझे ऐसे किरदारों को निभाने का मौका मिला, जो लीक से हटकर थे और जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।”
यह टैलेंटेड एक्ट्रेस जल्द ही अक्षय कुमार कीफ़िल्म ‘दुर्गावती’ के साथ-साथ पुरस्कार विजेता डायरेक्टर, अलंकृता श्रीवास्तव की ‘डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे’ में लीड रोल में नज़र आएंगी।
वह कहती हैं, “इसके लिए मैं अपने विजनरी फ़िल्म-मेकर्स को धन्यवाद देती हूं जिन्होंने इन शानदार महिलाओं की कहानियों को देश के लोगों के सामने लाने का बीड़ा उठाया है। उनकी सिनेमा का हिस्सा बनना और ऐसी दिलेर, शानदार, तथा आत्मविश्वास से भरी महिलाओं के किरदार को पर्दे पर उतारना मेरे लिए सम्मान की बात है।”
भूमि सिनेमा के जरिए लोगों को इस बात का एहसास कराना चाहती हैं कि, आज भी महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है और उन्हें यह दर्जा हासिल होना ही चाहिए। वह कहती हैं, “सिनेमा में मेरा सफ़र तो अभी शुरू हुआ है। मैं लगातार ऐसी महिलाओं की तलाश करती रहूंगी, जिनकी कहानियों को मैं पर्दे पर लोगों के सामने प्रस्तुत करना चाहती हूं।
मुझे लगता है कि जब लोग ऐसी महिलाओं और उनकी ज़िंदगी, उनके संघर्ष, उनके दर्द, उनके सपने, और उनकी जीत को देखते हैं, तो इससे लोगों के नज़रिए में भी बदलाव आ सकता है। इससे हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि हम समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने से अभी किस हद तक पीछे हैं, साथ ही हम यह जान सकते हैं कि हमारे देश और हमारे समाज को मजबूत बनाने में महिलाएं कितना अधिक योगदान दे सकती हैं।”


